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बजट 2020, और केंद्र में किसान

हम सभी जानते है कि खेती की लागत बढ़ती जा रही है। खाद बीज मंहगा होता जा रहा है। किसान 90 प्रतिशत हाईब्रीड बीजों को प्राईवेट कंपनियों से खरीद रहे है। किसानों को कंपनियों के चंगुल से निकलकर खुद से बीजों का संरक्षण करना होगा। 60 करोड़ लोग खेती से सीधे या परोक्ष रूप से जुड़े है, कृषि अर्थशास्त्रियों की मानें तो हर साल सरकार को 5 लाख करोड़ कृषि क्षेत्र में पूंजी निवेश करना होगा, जब तक सरकार ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बड़ा पूंजी निवेश नहीं करेगी तब तक गांव में खुशहाली नहीं आयेगी।

By Ashok Babu

बजट 2020 में किसान भी 20-20 की उम्मीद कर रहे थे पर बजट में खेती किसानी के लिए ऐसा कुछ ठोस दिखाई नही देता जिससे किसान की सीधी आमदनी बढ़े, पैसा सीधा किसान की जेब में पहुंचे, किसान की क्रय शक्ति बढ़े। जब देश की आर्थिक दर GDP निचले स्तर पर है, कृषि जानकारों के द्वारा कृषि क्षेत्र में बड़े निवेश की जरूरत थी, जहां ग्रामीण क्षेत्र में मांग को बढ़ाकर GDP बढ़ाने में मदद मिल सकती थी। हालांकि इस बजट में सरकार ने कृषि एवं सिंचाई के लिए 1.60 लाख करोड़ और ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज के लिए 1.23 लाख करोड़ का प्रावधान किया है। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत 6.11 करोड़ किसानों को फायदा पहुंचाया गया है लेकिन सॉयल हेल्थ कार्ड स्कीम से कितने किसानों को लाभ हुआ। पिछले बजट में 10 हजार किसान उत्पादक संघठन (FPO) को अगले पांच साल में बनाने की बात कही गयी, अभी तक कितने FPO का निर्माण किया गया, पिछले बजट में 80 आजीविका बिजनेस इंक्यूबेटर और 20 प्रोद्योगिकी बिजनेस इंक्युबेटर बनाए जाने का प्रस्ताव किया था, धरातल पर इन योजनाओं की क्या स्थिति है इस बारे में कोई जानकारी बजट में सीधे तौर पर नहीं दी गयी है।

किसान अपनी फसल का उचित मूल्य चाहता है। आज भी देश में केवल 6 प्रतिशत किसान ही न्यूनतम समर्थन मूल्य पर पर अपनी फसल बेच पा रहा है, बाकि किसानों का क्या, किसान को फसल का उचित मूल्य मिले इसके लिए सरकार को बजट में सार्थक और ठोस पहल करने की आवश्यकता थी। कृषि उपज मंडी समिति (APMC) के मुताबिक देश में इस वक्त 7600 मंडियां है यदि 5 किलोमीटर के दायरे में किसान को मंडी उपलब्ध करवाते है तो 42 हजार मंडियों की जरुरत होगी। विगत आर्थिक सर्वे में कृषि मशीनीकरण पर जोर दिया गया। पिछले वर्ष ट्रेक्टरों की खरीद 14 प्रतिशत कम रही, इसका कारण GST को बताया जा रहा है। कृषि मशीनीकरण को GST से मुक्त रखना चाहिए था।

बजट में वित्त मंत्री ने 16 सूत्रीय कार्यक्रम प्रस्तुत किया है। जिसमें सरकार द्वारा  कुछ सकारात्मक कदम जरूर उठाये गए हैं। बजट में 100 ऐसे जल संकट ग्रस्त जिलों को चिंहित किया गया है जिसमें सिंचाई के व्यापक उपाय किये जाएंगे। ब्लॉक एवं गांव स्तर पर माल गोदाम, कोल्ड स्टोरेज स्थापित करना अच्छी पहल है। स्वमं सहायता समूहों द्वारा ग्राम भंडारण योजना स्कीम चलाने का प्रस्ताव है। पीएम कुसुम योजना के अंतर्गत 20 लाख किसानों के पंपसेट को सोलर ऊर्जा से जोड़ा जाएगा। अन्य 15 लाख किसानों को सौर ऊर्जा निर्माण में सहयोग कर पावर ग्रिड से जोड़ने का प्रावधान किया गया है जिससे अन्न दाता को उर्जा दाता बनाया जा सके। एक उत्पाद : एक जिला, पर फोकस किया गया है। जहरीली हो रही खेती को रासायनिक खाद से जैविक खेती की ओर ले जाना सरकार की सकरात्मक सोच को दिखाता है। जिसके लिए राष्ट्रीय  जैविक उत्पादन बाजार का पोर्टल बनाया गया है। बजट में कृषिगत ऋण की सीमा को 10 लाख करोड़ से बढ़ाकर 15 लाख करोड़ किया गया है जिससे किसान को कम ब्याज दर पर पूंजी उपलब्ध हो सके, सार्थक पहल है। 2025 तक दूध प्रसंस्करण क्षमता को वर्तमान 53.5 मिलियन मीट्रिक टन से 108 मिलियन मीट्रिक टन पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है जो डेयरी सेक्टर को मजबूती प्रदान करेगा।

आज की जरूरत है किसानों को जागरुक होकर सरकार के साथ जुड़ना पड़ेगा। किसानों को एकजुट होकर कृषि उत्पादक संगठनों (FPO) का निर्माण करना होगा। जिससे बड़ी संख्या में किसान लाभ उठा रहे हैं। कृषि उत्पादक संगठन का कार्य निर्माण सरकारी संस्था स्मॉल फार्मरस अग्री बिजनेस कंसोर्टियम (SFAC) के द्वारा नियंत्रित किया जाता है। किसानों की आमदनी बढ़ाने में लघु कृषक कृषि व्यापार संघ (SFAC) का कार्य सराहनीय रहा है। 2014 से 2018 के बीच 551 कृषि उत्पादक संगठन (FPO) का गठन किया गया है जिसके माध्यम से लगभग 7.50 लाख लघु, मध्यम और सीमांत किसान लाभ उठा रहे है। किसान मशीनरी, उर्वरकों को किफायती दामों पर प्राप्त कर सकते हैं। इसमें मार्केटिंग तकनीक जैसे ग्रेडिंग, पैकेजिंग, लेबलिंग करना सिखाया जाता है जिससे किसान अपने उत्पाद का मूल्य संवर्धन (वैल्यू  एडिशन) कर पाते हैं साथ ही बाजार की उपलब्धता भी प्रदान की जाती है। SFAC के द्वारा उत्पाद को बेचने के लिंकेज की जाती है। गांव में वेयरहाउस और  कलेक्शन सेंटर  बने। किसान समूह में आएंगे तो ज्यादा ताकत होगी क्योंकि भारतीय किसान अपने उत्पाद की कीमत तय नहीं करता है मार्केट में बैठे कुछ बिचोलिये करते है। सरकार के प्रयास से कृषि उत्पादक संघटनों (FPO) को इलेक्ट्रॉनिक राष्ट्रीय कृषि बाजार (E- NAM) से जोड़ा जा रहा है। 2020 के अंत तक 1000  मंडियों को E- NAM से जोड़ा जाएंगा।

सरकार ने पीएम किसान सम्मान निधि योजना को किसानों के लिए बड़ा क्रांतिकारी कदम बताया था। सरकारी आंकड़ों के आधार पर पीएम किसान योजना का विश्लेषण जरूरी हो जाता है। कृषि मंत्रालय की रिपोर्ट में जारी किए गए आंकड़ों के अंतर्गत अब तक किसान सम्मान निधि की चार किस्तें किसानों तक पहुंची है। पीएम किसान योजना के शुरुआत में 8.80 करोड़ किसान लाभार्थियों को चिंहित किया गया जबकि पहली किस्त में किसान लाभार्थियों की संख्या 8.35 करोड़ थी। दूसरी किस्त में किसानों की संख्या 7.51 करोड़ थी जो तीसरी किस्त आते आते 6.12 करोड़ रह गयी, चौथी किस्त में किसान लभर्थियों की संख्या मात्र 3.01करोड़ पर आ गयी। आसानी से समझा जा सकता है कि 5 करोड़ 79 लाख लाभार्थियों को योजना से बाहर कर दिया। हो सकता है कुछ राज्य सरकारों ने इसे लागू न किया हो पर उत्तर प्रदेश के आंकड़ों पर नजर डाले तो पहली किस्त में लाभार्थियों की संख्या 1 करोड़ 85 लाख थी जो अब घटकर मात्र 77 लाख रह गयी है मतलब 1 करोड़ 8 लाख किसानों को दरकिनार कर दिया गया है।

हम सभी जानते है कि खेती की लागत बढ़ती जा रही है। खाद बीज मंहगा होता जा रहा है। किसान 90 प्रतिशत हाईब्रीड बीजों को प्राईवेट कंपनियों से खरीद रहे है। किसानों को कंपनियों के चंगुल से निकलकर खुद से बीजों का संरक्षण करना होगा। 60 करोड़ लोग खेती से सीधे या परोक्ष रूप से जुड़े है, कृषि अर्थशास्त्रियों की मानें तो हर साल सरकार को 5 लाख करोड़ कृषि क्षेत्र में पूंजी निवेश करना होगा, जब तक सरकार ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बड़ा पूंजी निवेश नहीं करेगी तब तक गांव में खुशहाली नहीं आयेगी।

(लेखक एक वरिष्ठ पत्रकार है, जो राज्य सभा चैनल में कार्यरत है जो उनके निजी विचार है)

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